Tuesday, February 16, 2016

55th day :: Ragging :- we should bear or not

      हमारे higher -education Colleges में रैगिंग का चलन पुराना हो चूका है जो कि अंगेज़ों की देन है। अब  सवाल उठता है कि क्या ये सही है। मेरे ख्याल से ये नियम बनाया गया था कॉलेज में आने वाले नए स्टूडेंट्स में से कुछ उद्दण्ड स्टूडेंट्स को अनुशासन सिखाने  लिए। लेकिन अब तो रैगिंग लेने वाले सीनियर ही उद्दण्ड होते हैं तो वो दूसरों को क्या सिखाएंगे। हमें रैगिंग को स्वीकार नहीं करना चाहिए क्योंकि ये हमारे आत्मसम्मान को तोड़कर रख देता है। कुछ लोगों का मानना होता है कि रैगिंग में सहयोग करने से उन्हें सीनियर्स का सहयोग मिलेगा। मैं इसे सही नहीं मानता। मैं  मानता हूँ कि अगर कोई सीनियर अच्छा है तो वह रैगिंग लिए बिना भी सहयोग करेगा और अगर बुरा है तो रैगिंग लेकर भी सहयोग नहीं करेगा।
   इसलिए हमें बेफिक्र होकर पूरे जोर से रैगिंग का विरोध करना चाहिए। 

54th Day :: Don't Judge the Book by it's Cover

        हमारा देश एक महान देश है जहाँ सैकड़ों महापुरुषों का जन्म हुआ है। इनमें से कुछ को उचित मान-सम्मान मिला तो कुछ को बस यूँ ही भुला दिया गया।  हम विभिन्न पार्टियों द्वारा समय-समय पर 'उनके' महापुरुषों का गुणगान करते  हुए देख सकते हैं। जो कि कुछ और नहीं बस उनके भ्रष्ट चेहरों पर एक मुखौटा लगाने की कवायद भर होती है। ऐसा नहीं है कि इन मुखौटों के पीछे के सभी चेहरे भ्रष्ट होते हैं ,इनमे से कुछ वास्तव में अच्छे भी होते हैं लेकिन अधिकतर चेहरे भ्रष्ट ही  होते हैं।
       वास्तव में गलती हमारी ही है,हम मुखौटों के आदी हो चुके हैं। पहले अंग्रेज़ों ने डंडा दिखाकर हमें लूटा फिर गाँधी जी का झंडा दिखाकर 50 -60 वर्षों तक हमें बेवक़ूफ़ बनाया गया और अब लोहिया , विवेकानंद , अम्बेडकर आदि के जैसे भूले-बिसरे महापुरुषों का मुखौटा लगाकर ये पार्टियाँ हमें बेवकूफ बनाना चाहती हैं, विकास और बिजली-पानी की बात कोई नहीं करता क्योंकि इसमें ज्यादा मेहनत लगती है ।
         आज राजनैतिक द्वेष की हालत ऐसी है कि राजीव-इंदिरा की फोटो डाक-टिकटों से हटाकर दूसरे महापुरुषों की फोटो लगाई जा रही है। मैं पूछता हूँ कि क्या इन महापुरुषों की फोटो राजीव-इंदिरा के साथ नहीं लगाई जा सकती थी।
         ये पार्टियाँ ऐसा दिखावा करती हैं जैसे कुछ particular महापुरुषों पर सिर्फ उन्हीं का copyright  है, अन्य का उनपर कोई अधिकार नहीं। जबकि मैं मानता हूँ कि कोई महापुरुष चाहे किसी भी पार्टी से जुड़ा हो, उसपर पूरे इंडिया का हक़ है।
          हम आखिर मुखौटे देखकर पूरी पार्टी को सही या गलत क्यों समझने लगते हैं।  इस तरह हम Cover देखकर पूरी किताब का अनुमान लगा लेते हैं कि वो सही है या गलत। जिसका फ़ायदा ये पार्टियां उठाती हैं। इसलिए हमें पार्टियों की विकास  नीति और उसे चलाने वाले वर्तमान राजनेताओं के गुणों के आधार पर पार्टियों का चुनाव करना चाहिए न कि महापुरुषों के मुखौटे के आधार पर।
          हम आखिर चेहरे देखते ही क्यों हैं, केवल आदर्शों को क्यों नहीं अपनाते।  बंद घडी भी दिन भर में कम से कम एक बार सही वक़्त जरूर बताती है।  इसलिए बुरी से बुरी छवि वाला व्यक्ति भी हमें कम से कम एक अच्छी सीख जरूर दे सकता है। vice-versa अच्छे से अच्छे छवि वाला व्यक्ति भी अपने जीवन में कम से कम एक गलती जरूर करता है। इसलिए हमें दूसरों के चेहरों को नहीं देखना चाहिए बल्कि उनके आदर्शों को अपनाना चाहिए। मैं तो यहाँ तक कहता हूँ कि हमें दूसरों के आदर्शो को भी जाँच -परखकर अपनाना चाहिए कि वो हमारे जीवन में उपयोगी है या नहीं, जैसे हम बाजार से सामान खरीदते हुए करते हैं। 

53rd Day :: Oppose of Hindi in Maharastra & Assam- Is it right?

      असम के बाद आजकल महाराष्ट्र में हिन्दी और हिंदीभाषियों का विरोध जोरों पर हो रहा है। जो लोग ऐसा कर रहे हैं क्या उन्हें पता है कि वो क्या कर रहे हैं। हिंदी केवल एक भाषा ही नहीं बल्कि राष्ट्र-भाषा है और इसलिए राष्ट्र-भाषा का विरोध राष्ट्र-विरोधी गतिविधि माना जाना चाहिए।
       हिंदी केवल इसलिए राष्ट्रभाषा नहीं बनी कि सत्ता में बैठे लोग हिन्दीभाषी थे बल्कि इसलिए बनी क्योंकि देश में अधिसंख्य लोग हिंदी बोल व समझ सकते थे।  तो फिर हिंदी का विरोध क्यों ?
       हम लोग बचपन में हिंदी की किताब में शिवाजी व महाराणा प्रताप आदि की वीरगाथाएँ पढ़ते थे। हिंदीभाषियों ने तो कभी भेदभाव नहीं किया कि शिवाजी मराठा थे  तो उनकी कहानी पढ़कर हिन्दीभाषी लोग क्यों जय-जयकार करें , तो फिर मराठी लोग हिंदी  बैर क्यों पाल रहे हैं।
       जहाँ तक महाराष्ट्र में हिंदीभाषियों के विरोध का सवाल है तो मुझे लगता है कि ऐसा इसलिए है कि वहां U.P. और बिहार से जाने वाले अधिसंख्य लोग मजदूर वर्ग के हैं।  जिनके चलते वहाँ U.P.  और बिहार वालों की गलत छवि बन गयी है।

...................................JAI HIND - JAI BHARAT.........................................

Saturday, February 13, 2016

52nd Day :: Tustikaran- Right or Wrong

                किसी विशेष वर्ग को एक limit से ज्यादा सुविधाएँ देना तुष्टिकरण कहलाता है।  तुष्टिकरण एक ऐसी चीज है जो जबतक हमारे लिए होती है तो अच्छी लगती है लेकिन यही चीज जब दूसरों के लिए हो तो हमें बुरी लगती है।
  Overall देखें  तो समाज के लिए ये एक अभिशॉप है। कभी कोई पार्टी मुसलमानों के लिए तुष्टिकरण करती है   तो इससे हिन्दुओं में असंतोष , कुंठा और मुसलमानों के प्रति नफ़रत पैदा होती है। इसी तरह जब दलितों का तुष्टिकरण किया जाता है तो उच्च वर्ग में असंतोष पैदा होता है।
                इन दोनों वर्गों से बदले के नाम पर अब 'हिन्दुत्व' के नाम से आम हिन्दू के तुष्टिकरण की नीति चलाई जा रही है जो कि उतनी ही घातक है जितना कि मुसलमानों और दलितों का तुष्टिकरण।
  वोट-बैंक पक्का करने के चक्कर में विभिन्न पार्टियों द्वारा विभिन्न वर्गों के लिए चलाई जा रही तुष्टिकरण की नीति वास्तव में उस particular वर्ग को दशकों पीछे ले जाती हैं।  इसलिए अब हिन्दुओं को तय करना है कि हिन्दू -तुष्टिकरण  का समर्थन करके उन्हें दशकों पीछे जाना है या तुष्टिकरण की नीति का विरोध करके  आगे।    

51th Day :: Antisocial Elements on Social Media

      Technology के विकास के साथ Social Sites की भी बाढ़ आ गयी है साथ ही आ गयी है इन साइट्स पर अच्छे-बुरे Comments की बाढ़।  आजकल सोशल साइट्स का इस्तेमाल भद्दे jokes और गाली-गलौज़ के लिए किया जा रहा है। उसपर सोशल-साइट्स का इस्तेमाल राज़नीति के लिए होना कोढ़ पर खाज की तरह काम कर रहा है। इसके माध्यम से राजनैतिक लोग अपने प्रतिद्वंदियों के खिलाफ काफ़ी निजी और आपत्तिजनक Comments कर रहे हैं।
       समस्या यह है कि इन्हें Controll करने के लिए कोई स्वतंत्र संस्था नहीं है।
       मैं ये नहीं कह रहा हूँ कि सोशल-साइट्स का इस्तेमाल गलत है लेकिन मैं ये जरूर कहना चाहता हूँ कि किसी स्वतंत्र संस्था द्वारा इसकी निगरानी जरूर होनी चाहिए जो बिना किसी राजनैतिक लगाव या द्वेष के इन साइट्स को साफ़-सुथरा बनाये ताकि एक आम व्यक्ति बेहिचक इन साइट्स का इस्तेमाल कर सके।      

50 th Day :: The Beuty of Cactus

लोग फूलों की खूबसूरती तो देखते हैं लेकिन काँटों की परवाह कोई नहीं करता।  मुझे तो गुलाब के फूलों के साथ-साथ उसके काँटों में भी खूबसूरती नज़र आती है और गुलाब के काँटों की खूबसूरती है कि वो कैसे उस फूल की सुरक्षा के लिए तत्पर रहता है।
इसी तरह काँटों में भी सबसे खूबसूरत मुझे Cactus का पौधा लगता है और Cactus की सुंदरता है, जीवन जीने के लिए संघर्ष करने की उसकी क्षमता।
    Cactus उस तपते रेगिस्तान में भी ज़िंदा रहता है जहाँ ज़मीन और पानी का कोई नामोनिशान नहीं होता और जैसे ही बदलते मौसम के साथ  पानी की दो बूँदें इसे मिलती हैं ये फिर से हरा हो जाता है और यहाँ तक कि इसमें फूल भी निकल आते हैं।
                हमें भी कैक्टस की तरह ही जीने की सीख लेनी चाहिए।  हमें भी ज़िन्दगी में आने वाली तूफानी मुसीबतों  का सामना डटकर करना चाहिए, इनसे हार नहीं माननी चाहिए और जैसे ही अनुकूल समय आये हमें ज़िन्दगी का स्वागत मुस्कराकर करना चाहिए।