Saturday, August 31, 2013

46th Day :: Colour Mystery

फिल्मों का कलर 'ब्लू'  होते ही वो गन्दी क्यों हो जाती है (blue film), area का कलर 'रेड' होते ही वो बदनाम क्यों हो जाती है (red light area), अवैध तरीके से इकठ्ठा किया गया पैसे का कलर 'black' क्यों होता है(black money),suger का कलर 'brown' होते ही ये नशीली क्यों हो जाती है(brown suger) , फिल्मों में विलेन का रोल हमेशा 'grey shed' में क्यों होता है और इन सब काले कारनामों को हरी झण्डी दिखाने वाले नेता 'सफेदपोश' क्यों कहलाते हैं। नीली और लाल बत्ती ऐसे ही सफेदपोशों को ही क्यों मिलता है और अंत में नीली और लाल बत्ती ही सबसे ताकतवर क्यों है ???

मुझे तो केवल 'पानी दा रंग' पसंद है , बिल्कुल transeparent !  जिस बर्तन में जाता है उसी का आकार ले लेता है, उसी के रंग का  दिखने भी लगता है लेकिन लोगों की प्यास बुझाने और जीवन देने के अपने गुण को नहीं छोड़ता। 

45th Day :: filmy style of wild Underworld

दुनिया में सिर्फ साइंस में ही तरक्की नहीं हो रही है , और चीजों में भी तरक्की हो रही है। चीजें hitech होने के साथ स्टाइलिश भी हो रही हैं। अब अंडरवर्ल्ड को ही ले लीजिये , अब ये पुराने जानवरों(शेर,भालू,भेड़िया, साँप, चूहा , बिल्ली , खरगोश आदि स्टाइल )  वाले तरीके नहीं अपनाता जैसे कि काम कराने के लिए डराना-धमकाना और कामं न होने पर  मार देना। अब अंडरवर्ल्ड किसी को  धमकाने या मारने का काम भी style से करता है जैसे किसी को सजा देने के लिए कोई 'जिन्दा ' style में सालों तक कैद करके रखता  , कोई देवदास style में दो लड़कियों के बीच में फँसाकर किसी का दिल बर्बाद करता है तो कोई 'डर' स्टाइल में किसी के दिल में उसके lover का वहम पैदा करके उसे एक जगह  से दूसरे जगह दौडाता है या किसी और फिल्म के विलेन  का ट्रिक लेकर डर पैदा करने की कोशिश करता है ।  कोई भेजा-फ्राई करने में आगे है तो कोई पर्सनल बातों के आधार पर COMMENT करके अपने शिकार को परेशान करता है।  इसी तरह के कई तरीके हैं। 

44th Day :: Space is not in vaccume

Some days ago when I was boiling water, I saw that many small particles were started to move in a circle. there some more particles who are smaller than those particles are moving around the big particles. this whole system is looking same as our solar system. Thus I have 'guessed' some properties of our solar system which r as bellow:-
1.  Our solar system is in a liquid medium made of a transparent but very tiny particles who has not discovered till now.
2.  if space is in a vaccume then by applying Newton's theory there should never need energy to travel because of absence of friction. so any rocket should travel with the velocity when it leaves the gravity field of earth & need no energy source until it gets in touch of gravity field of any planet.
3.  not big but a reason to think so is that in space things follow the rule of a liquid, I mean they  float in space.
4.  again if we apply Newton's law in space then things who are moving will keep moving until we apply opposite force. so it's impossible to come out of the rocket & then moving or stopping after moving in space.

43rd Day :: Media & Multimedia

कभी आजादी दिलाने के लिए लोगों को जगाने और क्रांति करने के लिए प्रेरित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाला media महज चन्द  पावरफुल लोगों के हाथों की कठपुतली सा बनता जा रहा है। अब मीडिया का काम केवल विभिन्न कंपनियों और celebrities या राजनेताओं का प्रचार करना भर रह गया है। जनता की आवाज़ उठाने की इन्हें अब फुर्सत ही नहीं रह गयी है। दुर्भाग्य से अब तो झूठ भी सीना तानकर परोसा जाने लगा है जबकि जरूरत न सिर्फ सच बल्कि सही को दिखाने की है। इनका ध्यान अधिकतर केवल स्टिंग ऑपरेशन पर ही लगा रहता है क्योंकि इससे सनसनी फैलती है। जो कि अधिकतर political दबाव बनाने की रणनीति का ही हिस्सा होता है। बड़े रिश्वतखोर नेताओं और आपराधिक रिकार्ड वाले व्यक्तियों का स्टिंग ऑपरेशन तो समझ में आता है लेकिन सही छवि वाले लोगों की निजी जिंदगी में झाँकने की इजाजत इन्हें कौन दे देता है। इनका तर्क होता है कि सार्वजनिक लाइफ जीने वाले लोगों के बारे में सबकुछ जानना जनता का हक है। ठीक है कि सार्वजनिक क्षेत्र में काम करने वाले actors , actresses या कोई अन्य व्यक्ति प्रचार के लिए अपनी कुछ निजी जानकारियाँ दे दें और आपको अपने घर में घुसने का हक दे दें। लेकिन इसका मतलब ये नहीं कि बिना पूछे आप उनके बाथरूम या बेडरूम में घुस जाएँ। क्योंकि हमाम में  तो सभी नंगे हैं। सड़क पर नंगा होना अपराध है न कि बाथरूम या बेडरूम में। इतना ख्याल तो मीडिया को रखना ही चाहिए कि उनकी वजह से सार्वजनिक क्षेत्र के सही लोगों को  भावनात्मक चोट न पहुँचे, वैसे भी कलाकार निजी तौर पर इमोशनल होते हैं। हालाँकि इधर 1-2 सालों  में मीडिया, खासतौर पर print मीडिया में अच्छा बदलाव देखने को मिला है। जैसे कि साइंस , web , computer आदि के साथ-साथ गाइड  वाले thoughts आदि।
आजकल मीडिया काफी हद तक उस contract killer की तरह हो गया है जिसका काम है लाभ लेकर किसी बुरे  से बुरे व्यक्ति को भी अच्छी छवि दे देना या अच्छे से अच्छे व्यक्ति को भी पलक झपकते ही लोगों की नज़रों में रावण साबित कर देना। क्या ये जनता से धोखा और उसकी भावनाओं के साथ खिलवाड़ नहीं है ?
उदाहरण के लिए अमेरिका जैसे देश में जहाँ sex के मामले में समाज में बहुत खुलापन है,  वहाँ भी बिल क्लिंटन की एक प्रेमिका 10-15 साल पुराने सम्बन्ध के चलते उनपर ये आरोप लगाया और क्लिंटन की कुर्सी चली गयी।  वहीं यही मीडिया भारत जैसे देश में जहाँ सेक्स के मामले में खुलापन नहीं है , फिर भी कुछ बड़े उद्योगपतियों और नेताओं आदि को models के साथ पार्टी करते दिखाया जाता है और कहा जाता है कि वे कितने बड़े 'सेलिब्रिटी' हैं या glamourus हैं। मीडिया को इन लोगों की जीवनशैली से कोई आपत्ति नहीं होती।
एक और example के रूप में हमारे देश में भी मौजूद कुछ  चैनल्स हैं जिनका काम केवल कुछ selected celebrities को टारगेट करके comment करना है और उनकी खिल्ली उडाना है। 

42nd Day :: Power management & leadership

दुनिया में power के कई केन्द्र हैं। किसी के पास  पैसे की , किसी के पास बाहुबल की , कोई politics में महारत रखता है तो कोई जनमत जुटाने में , कोई ऐसा डॉक्टर है जो बड़ी से बड़ी बीमारियाँ ठीक कर सकता है तो कोई पलक झपकते ही किसी भी देश में महामारी फैला सकता है। कोई हथियार बनाने और बेचने में उस्ताद है तो कोई शांति-प्रक्रिया  के द्वारा बिना हथियार उठाये ही जंग जीतने में निपुण। किसी के पास ऐसी मीडिया की ताकत है जो सुच को कहीं से भी खोदकर निकलने में सक्षम है तो कोई इतना बड़ा lawer (i will prefer to call as 'Lier' ) है जो बड़े से बड़े सच को भी  साबित कर देता है। 
कुल मिलाकर दुनिया में अच्छी और बुरी कई तरह की ताकतें हैं। बुरी ताकतों के मालिक का उद्देश्य गलत होता है इसलिए वो सही ताकत को भी गलत तरीके से इस्तेमाल करके लोगों से  लेने की कोशिश में लगे रहते हैं लेकिन उन्हें ये पता  होता की हमारा persanal फायदा सबसे ज्यादा तब होता है जब हम खुद से पहले दूसरों के फायदे की बात सोचते हैं। ऐसे लोग अक्सर कालिदास की तरह होते हैं जो अनजाने में वही डाल काट रहे होते हैं जिसपर वो  होते हैं। इनका उदाहरण criminal network हैं  मुख्य rule होता है कि किसी तरह से ऊपर पहुँचना चाहे इसके लिए अपने से ऊपर वाले को काटना ही पड़े नतीजा यह होता है कि ऐसे network में नीचे से  ऊपर तक एक दुसरे को मारने-काटने का क्रम चलता रहता है और एक दिन वो भी आता है जब ये नियम सिखाने वाला भी किसी नीचे वाले के द्वारा मारा  जाता है। इस तरह नेत्रित्व कर रहा व्यक्ति खुद अपने सहयोगियों को अपना ही गला काटने की सुपारी दे रहा होता है और खुद को बहुत अक्लमंद और ताकतवर समझता है । ऐसा नेटवर्क अगर कुछ समय तक एकजुट भी रहता है तो केवल विरोधियों के सफाए तक ही लेकिन उसके बाद आपस में ही लड़ मरते हैं। बड़े स्तर पर देखें तो पकिस्तान का लगातार तख्तापलट इसी का एक उदाहरण है,वो तभी तक एकजुट रहते हैं जब तक का विरोध करते हैं ।
 वहीँ अच्छे संगठन का नेता अपने सहयोगियों को अपनी properties बढाकर आगे बढ़ने को प्रोत्साहित करता है जिसका ससे बड़ा फायदा यह होता है कि टॉप पर चाहे जो भी हो तरक्की सबकी होती है और संगठन की overall तरक्की ज़रूर होती है। 
एक अच्छे leader की common qualities तो सभी जानते है जैसे कि वो प्रभाव छोड़ने वाला, वाक्पटु , स्पष्टवादी , ईमानदार , समझदार , साहसी और दूरदर्शी आदि होना चाहिए लेकिन मेरे ख्याल से कुछ विशेष  गुण ज़रूर होना चाहिए जैसे संगठन का  आधार केवल सही और गलत हो न कि कुछ और।  मतलब कि अगर हमारा दुश्मन सही है तो उसके छोटा होने पर भी उससे माफ़ी माँगने को तैयार रहना चाहिए और अगर कोई अपना गलत हो तो उसे भी सज़ा  देकर सुधारने या न सुधरने पर उसे संगठन से निकालने  जैसा कठोर कदम उठाने को भी तैयार रहना चाहिए । वर्तमान में अधिकतर लड़ाइयाँ इसलिए होती हैं क्योंकि हम ये मानकर चलते हैं कि अगर कोई हमारा दोस्त है तो उसकी हर लड़ाई में उसका साथ देना है चाहे वो कितना ही गलत क्यों न हो ,जबकि  हमें अपने दोस्त को उसकी गलती बताकर उसे सुधारने के लिए कहना चाहिए। दूसरा कि बड़े से बड़े दुश्मन से  लड़ते हुए भी किसी भी STAGE पर बातचीत के जरिये मामले का सम्पूर्ण समाधान निकालने का एक रास्ता जरूर खुला रखना चाहिए अगर दुश्मन का अपराध ज़रा सा भी क्षमायोग्य हो। मेरी LIFE में भी समस्या के रूप में ही सही लेकिन नेतृत्व करने का एक मौका आया था लेकिन मैंने अपनों को HANDLE न कर पाने की अपनी कमजोरी को जानते हुए नेतृत्व न करने का फैसला किया क्योंकि मुझे लगता था कि बिना  क्षमता के नेतृत्व करने पर मेरे साथ-साथ बाकियों की भी पढ़ाई बर्बाद हो जायेगी,उस समय तक मैं केवल लोगों को 'न' कहना सीख रहा था ।
संगठन के धार्मिक होने पर एक समस्या और आती है कि ऐसे  में एक संगठन देवता के रूप में परिभाषित हो जाता है तो दूसरा राक्षस के रूप में। ये एक ऐसी स्थिति होती है जिसमें बातचीत की कोई भी गुन्जाईस नहीं बचती। 'देवता' शब्द का व्यावहारिक अर्थ है कोई ऐसा जो कभी गलत न हो और 'राक्षस' शब्द का अर्थ है कि कोई ऐसा जो कभी सही न हो,जिसे सुधारना कभी संभव न हो और जिसका खत्म ही एकमात्र SOLUTION हो। लेकिन हम जानते हैं कि 'NOTHING IS PERFECT IN THIS IMPERFECT WORLD'. कम से कम इस दुनिया में तो कोई आदमी न तो १००% सही ही हो सकता है न १००% गलत। इसीलिए कई संगठनों या देशों की लड़ाई जो देवता बनाम राक्षस हो जाती है , उनका कभी SOLUTION नहीं निकलता, लोग मरते जाते हैं लेकिन बुराई नहीं ।
उदाहरण के लिए जिस व्यक्ति को आप राक्षस बताकर मार रहे हैं उसके परिवार के किसी बच्चे को बदले की आग में जलने से  से कैसे  रोक पायेंगे और क्या फिर आप उसे समझा पाएँगे ? कम से कम उस बच्चे को समझाना , उस 'राक्षस' को समझाकर रास्ते पर लाने से निश्चय ही कठिन होगा। (यही वजह है कि दुनिया में कई अच्छे संगठन या देश,जिनका मूल उद्देश्य शान्ति और विकास है,वे भी आपस में लड़ते रहते हैं क्योंकि वो अपना घमण्ड नहीं छोड़ पाते या अपने संबंधों का आधार सही-गलत न रखकर कुछ और रखते हैं या ऐसी ही कुछ और छोटी-छोटी बातें वजह बन जाती  हैं।)
यही ज़रा सा फर्क था राम और बुद्ध में। राम ने जहाँ कैकेयी के वरदान से मजबूर होकर अपना राजमहल छोड़ा  वहीं बुद्ध ने दूसरों का दुःख-दर्द न कर पाने और उसे दूर करने के लिए स्वेच्छा से अपना राजमहल छोड़ा। राम ने जहाँ रावण को मारकर 'बुराई पर अच्छाई की जीत' का उदाहरण पेश किया वहीं बुद्ध ने अंगुलिमाल को वाल्मीकि में बदलकर 'बुराई को अच्छाई' में बदलने का बेहतर उदाहरण पेश किया। जहाँ राम सम्पूर्ण भारत पर शासन करने वाले राजा बने वहीं पूरे भारत को जीतने वाला सम्राट अशोक अपने पापों का प्रायश्चित करने और शान्ति पाने के लिए बुद्ध की शरण में आया। जहाँ राम ने सीता के चरित्र की जाँच के लिए उनकी 'अग्निपरीक्षा' ली वहीं बुद्ध ने बौद्ध भिक्षुओं के लिए स्त्री-स्पर्श वर्जित होते हुए भी एक शिष्य के द्वारा एक स्त्री को उठाकर नदी पार कराने पर उसको आशीर्वाद देकर बुद्ध ने एक अच्छा उदाहरण दिया क्योंकि वो जानते थे कि उस बौद्ध भिक्षु की मनोदशा बुरी नहीं थी। एक और बात अगर राम की जगह बुद्ध रावण के सामने रहे होते तो शायद आज समुद्र का पानी मीठा होता जो रावण करना चाहता था और कुछ और अच्छी चीजों के साथ शायद वाल्मीकि की तरह एक और  महाकाव्य लिखने वाला होता जो कोई और नहीं रावण ही होता। 

Friday, August 30, 2013

Bazaarvaad in medication + role of bad medicines in different fields

aaj lagta hai ki mai  experiment me  use hone wala chooha ban gayaa hun.saaalon se kabhi ye kabhi wo dawaa kha-khaakar main pareshaan ho gayaa hun. Ek baar faayada karne ke baad bhi doctor dawaayen badal deta hai aur nayi dawaa dekar uska asar jaanne ki koshish mein lag jaata hai. Vastav mein nayi dawa ka gareeb aura aam logon par ‘experiment’ karne ki beemaari ab mahaamaari ka roop le chuki hai.ismen doctor ko MR’s se kameetion mil jaata hai,dawa kampaniyon ko apni dawa ke bare mein upyogi feedback mil jaata hai lekin thagaa jaata hai kewal bechaara gareeb aam aadmi,jo ki ilaaj ka mahanga kharch bhi uthaata hai aur nayi dawaaon ke istemaal se hone waale ‘side effect ko bhi jhelta hai aur agar saubhagya se dawa asarkaarak hui to us dawa ki bikri aur daam badh jaate hain lekin us aadmi ko koi faayada nahin milta.use side effect hone par bhi koi muaawajaa nahin milta, bhale hi side effect se us aadmi ki jaan hi kyon n chali jaay aur paper mein hamein ye padhane ko milta hai ki briten ya amerika me shodhkartaaon ne 14081 logon par sarvakshan kiya aur paaya ki ye dawaa is tarah se faayademand hai aur ismein ye-ye side effects hain.agar ye experiment sach mein briten ya amerika mein hi hote hain to phir wahan kisi ko side effect kyon nahin hota.me
Bachpan mein main eek nibandh padha tha-‘vigyaan vardaan ya abhishaap’aur aaj usi science ke ek part ‘medical science’ ka yah –ve pahloo hamaare saamne hai.baat yahin khatm nahin hoti. Maine pahale bhi bazaarvaad ko aaj ka sabse bada khatra kahaa tha, aaj ise aur spasht karna chaahta hun.baazaar me cheejein banna shuru to hoti hai logon ki jaroorat ke aadhaar par lekin ek limit ke baad jab selling fix ho jaati hai ya us kshetra mein extra players aa jaate hain to kampaniyayan apna munaafa badhaane ke liye demand paida karne ki koshish karne lagti hain.ye zabardasti demand paida karne ke liye apnaaye jaane waale ulte-seedhe hathkande kai samasyaon ka kaaran ban jaate hain.ye kareeb-kareeb waisa hi hota hai jaise ki sone ke ande dene waali murgi se ek din me ek se zyaada ande nikaalne ke chakkar mein murgi ko hi kaat dena ya phir zyaada fasal ugaane ke chakkar mein itnaa khaad aur keetnaashak daal dena ki dharti hi banzar ho jaaye.durbhagya se aaj lagbhag sabhi kampaniyan aisa hi karti dikhaai de rahi hain.chaahe wo khaane-peene ki vastuyen banaane waali kampaniyan hon, hathiyaar banaane waali ya koi anya kampany.
Ab ek jhadte baalon ko rokne waale utpaad ke ad ki hi baat lein,jismein takle aadmi ko samaaj mein kaafi beijjat hote huye dikhaaya jaata hai. Ab us takle aadmi ke paas kewal do vikalp bachate hain ki ya to wo us kampany ke mahange product ko istemaal kare(bhale hi wo product uske bajat mein ho ya n ho) ya phir suicide kar le. Kya aisa bazaarvaad sahi hai? Philhaal main dawaaon ke bazaarwaad par hi baat karta hun.yahan bhi kai jagah dawaaon ki demand ‘create’ ki jaati hai.zaahir si baat hai ki dawaaon ki demand badhaane ke liye kisi bhi tarah beemaari failaane waale virus chodna ya bazaar me bikne waali  khaane-peene ki cheejon me halka jahreela padarth milwa dena kaafi aasaan kaam hai.yah khel kewal doctor hi nahin balki dhongi baaba aur ojha-tantrik bhi milkar khelte hain.Aakhir saalon se jis beemari ko kai doctor nahin thik kar paate use achaanak koi ojha-tantrik kaise theek kar deta hai? kya aisa nahin lagta ki pahle wahi baba beemari failaane wala jahar kisi tarah khilaata hai, phir usi ka ilaaj kar ke paise lootataa hai? wastav me yah har cheese ko bechane ka aam tareeka ho gaya hai ki pahle samasya paida karo phir usi samasya ko solve karne wala product logon ke saamne le jaakar unhen chain se looto. Yah bhagwaan ke roop mein jaane jaane waale kuch doctoron ka doosra saitaani chehraa hai. Doctor ke is chehre ka aur bhi jaghon par use hai. Jaise ki organized crime ke liye ladkon ko shaareerik aur maansik roop se logon ko taiyaar karna, jaise ki nayi bharti waale aatankavaadiyon ka ‘brainwash’ karna.
Is tarah se -ve dawaaon ka ek kshetra aur bhi hai aur wo hai ‘fixing’. Is baat par kai logon ko aashcharya hoga kyonki sabhi bas yahi jaante hain ki fixing kewal laalach ya dark i wajah se hi hoti hai lekin fixing ka ek aur angle bhi hai aur wo hai kisi achche khilaadi ki performance bigaadne waali ya kamzor khilaadiyon ki performance badhaane waali dawaaon ka istemaal bhi ho sakta haiaur ye dawaayen itni hain ki doping test mein bhi pakad mein nahin aati.maan leejiye ki bhaarat ka cricket match Australia se hai aur ek din pahle khilaadiyon ko anxiety jaisi maansik beemari ko paida karne waali dawaa thodi matra mein de dein to agle din raahul dravid jaisa dharywaan khilaadi bhi nishchit hi australiyaai khilaadiyon ke uksaane par ulte seedhe shot khelkar apna vicket ganvaa dega aur ye dawaa jaldi pakad me bhi nahin aayegi.aajkal to inhen pakadna aur bhi mushkil hai kyonki ab aise genetically modified hybrid beej taiyaar kiye ja rahe hain jinmein automatically aisi dawaaon ki khaasiyat hai.
Hollywood me ek film aayi thi-"the matrix",jisme actor kalpanic mayajaal se ladta hai lekin aaj jab mai medical science ke misuse ke poore field ko dekhata hu to khud ko aise hi ek matrix me pata hu jisme sab kuch dawaaon se control kiya ja rahaa hai,especially tab jab ham biology ke misuse ke dvaara genetically kisi prakaar ki kamjori ya beemari paida karne waale khadya padarthon ko jod le to.matlab ki ek doctor apni suvidha aur jaroorat ke anusaar logon ko sharer ya dimaag se kamjor ya taakatvar banaa sakta hai.
Political pressure create karne ke liye bhi in dawaaon ka istemaal kiya jaata hai aur agar main galat nahin hun to duniya bhar ke jaanwaron(underworld) ke circus ke show ko sanchaalit karne waala ‘ring master’ bhi yahi hai.(D=doctor)