Friday, January 18, 2013

32nd Day :: Curse of being 'General'

आजकल जब हर नेता या socialist Sc , St , अल्पसंख्यकों और पिछड़ों के आरक्षण को बढ़ाने की बात कर रहे हैं, ऐसे समय में मैं general categary के दर्द को बयाँ करने की हिम्मत कर रहा हूँ।
आजकल चुनाव-दर-चुनाव इन वर्गों के कथित हिमायती नेता इस आरक्षण को बढ़ाने की बात करके अपना वोट-बैंक पक्का करने की जुगत में लगे रहते हैं। लेकिन क्या इन्हें जरा भी अहसास है कि general categary के लोगों को इससे कितनी समस्या हो रही है?
पहले पढ़ाई में छात्रवृत्ति, admission में आरक्षण, फिर competitive exams में 5-10 % की छूट। next is what ?  आरक्षण का % बढ़ाना, गैस के दाम में छूट  फिर राशन, बिजली, गैस आदि की लाइन में इन वर्गों को वरीयता देना आदि। सोचिये जरा आपको कैसा लगेगा अगर आप 3 घंटे से गैस लेने के लिए लाइन में लगे हों और तभी तुरंत आये किसी व्यक्ति को आपके आगे कर दिया जाय सिर्फ इस आधार पर क्योंकि उसने 'Rupa frontline' पहना हो!
और यह सब तब है जब अधिकतर tax, general categary के लोगों द्वारा भरा जाता है जिससे सरकार चलती है। यह स्थिति कुछ ऐसी है जैसे कोई व्यक्ति होटल में दूसरों का बिल भरे फिर भी उसे सबसे बाद में और कम मात्रा में भोजन दिया जाय। क्या इससे general categary के लोगों में कुण्ठा और निम्न वर्ग के प्रति द्वेष की भावना नहीं पैदा होती?
general categary की कुण्ठा को अगर अभी नहीं समझा गया और इसे दूर करने का प्रयास नहीं किया गया तो सिर्फ 1-2 दशक में ही general वर्ग और निम्न वर्ग के बीच टकराव की स्थिति पैदा हो जाएगी और यह टकराव हमारे देश को कई दशक पीछे ले जाएगा।
स्वयं डा. भीमराव अम्बेडकर,जिन्होंने संविधान बनाया था,ने भी आरक्षण को इतने व्यापक तौर पर और इतने अधिक  समय तक लागू करने की बात नहीं सोची थी, उनके अनुसार भी ये 1-2 दशक पहले ही समाप्त हो जाना चाहिए था। मगर कुछ तो निम्न वर्ग के पर्याप्त विकास न कर पाने तो कुछ वोट-बैंक की राजनीति के कारण इसे ज्यादा समय के लिए और ज्यादा मात्रा में लागू किया जा रहा है ।
ऐसा नहीं है कि आरक्षण general categary को ही नुकसान पहुँचा रहा है, ये निम्न वर्ग के आत्मनिर्भर बनने में भी बाधक है-
e.g.
  1. छोटे बच्चे को उसका अभिभावक थोड़े समय के लिए अपनी उँगली पकड़ाकर चलाता है फिर उँगली छोड़ देता है  जिससे वो खुद से चलना सीख सके।
  2. थोड़ा बड़ा होने पर जब कोई साइकिल चलाना सीख रहा होता है तो सिखाने वाला कुछ समय तक पीछे से साइकिल पकड़े रहता है और सही मौका देखकर बिना बताये साइकिल छोड़ देता है जिससे चलाने वाला खुद से साइकिल चलाना सीख सके।

इस समस्या के समाधान के रूप में मेरे कुछ सुझाव हैं :-
  1. वर्तमान व्यापक आरक्षण का लाभ सिर्फ विकलांगों को ही देना चाहिए। कुछ दशकों तक इसे महिलाओं के लिए भी जारी रखा जा सकता है।
  2. बाकी वर्गों को आरक्षण का लाभ आर्थिक आधार पर देना चाहिए न कि जातिगत आधार पर। इसका लाभ यह होगा कि निम्न वर्ग के अधिकतर लोग तो आरक्षण का लाभ पायेंगे ही साथ ही general categary के भी गरीब लोग इसका लाभ पा सकेंगे जिससे किसी वर्ग में कुण्ठा या आपसी द्वेष नहीं होगा ।  इससे इन वर्गों के बीच टकराव की स्थिति नहीं उत्पन्न होगी।
  3. शिक्षा सभी वर्गों के लिए जरूरी है। ये एक ऐसी सीढ़ी है जो सभी वर्गों को जोड़ सकती है और जिसपर चढ़कर अपनी मेहनत और लगन के बल पर हर वर्ग के लोग ऊँचे से ऊँचा मुकाम हासिल कर सकते हैं ।  इसलिए हमें हर वर्ग के अधिक से अधिक लोगों को शिक्षा से जोड़ने और शिक्षा की गुणवत्ता बढाने का प्रयास करना चाहिए। इसके बाद आर्थिक रूप से कमजोर छात्रों के लिए पर्याप्त छात्रवृत्ति की व्यवस्था करनी चाहिए। आखिर डा. भीमराव अम्बेडकर भी विषम परिस्थितियों में भी शिक्षा की डोर पकड़कर ही अपनी तरक्की किये जिससे उन्हें उस दौर में भी संविधान-निर्माण जैसी महत्वपूर्ण जिम्मेदारी मिली।
  4. नौकरिओं और promotion आदि में आरक्षण की जगह हमें निम्न वर्ग के लिए मुफ्त में विशेष training  की व्यवस्था करनी चाहिए जिससे उनमें नौकरी और promotion पाने की स्वाभाविक ability develop हो सके और वो जल्दी-से-जल्दी अपने पैरों पर खड़े हो सकें। वर्तमान आरक्षण व्यवस्था का एक दुष्परिणाम ये भी है कि इससे कंपनियों में अपेक्षाकृत कम कुशल लोगों की भर्ती हो जाती है जो उस कम्पनी की क्षमता को कमजोर करते हैं और जिसकी वजह से देश की अर्थव्यवस्था भी कुछ हद तक कमजोर होती है।

Friday, January 11, 2013

Kuch yaad unhe bhi kar lo jo laut ke ghar naa aaye...

पाक द्वारा फिर दो भारतीय सैनिकों की बर्बरता के साथ हत्या कर दी गयी। पाक की यह हरकत नयी नहीं है, पहले भी वह भारत के शांति-बहाली के प्रयासों को कमजोरी समझकर कारगिल युद्ध छेड़ चुका है लेकिन भारत उसकी इस हरकत का मुंहतोड़ जवाब देने के बजाय मामले को विश्व समुदाय के सामने रखने की बात कर रहा है । क्या कारगिल-युद्ध के बाद भी विश्व को कोई और सबूत देने की ज़रुरत है जिससे पाकिस्तान की नापाक सोच ज़ाहिर हो सके ? और आखिर कारगिल युद्ध के समय अन्तर्राष्ट्रीय नियम तोड़ने पर थोड़े समय के आर्थिक प्रतिबन्ध के अलावा पाक के खिलाफ क्या कोई प्रभावी कदम विश्व-समुदाय ने उठाया ? फिर हम विश्व-समुदाय की चिन्ता क्यों करते हैं? हम क्यों अमेरिका की तरह निर्णायक कार्रवाई क्यों नहीं करते? बेशक युद्ध से अशान्ति फैलती हो मगर कभी-2 ये शान्ति पाने के लिए भी जरूरी हो जाता है।
 कायराना ही सही पर वास्तव में ये पाक की युद्ध की रणनीति रही है कि एक ओर  तो वो हिना रब्बानी जैसे लोगों को विदेश-मंत्री के तौर पर भारत भेजता है जो यह साबित  की कोशिश करते हैं कि वो भारत के साथ शांति चाहते हैं तो दूसरी तरफ वो हमला करके भारतीय सैनिकों का सर कलम करता है क्योंकि वो जानता है कि ऐसे मौके पर भारत जवाबी कार्रवाई नहीं करेगा।इसी कायराना हरकत को वो गुरिल्ला युद्ध का नाम देता है , जिसके  तहत वो हमेशा ऐसे समय हमला करता है जब भारत का गुस्सा ठंडा होता है।
अगर हिना रब्बानी जैसे  नेता पाकिस्तान के असली चेहरे के मुखौटे नहीं हैं तो भी इतना तो साफ़ हो जाता है कि  इन नेताओं का पाकिस्तानी सेना पर कोई नियंत्रण नहीं है। फिर शान्ति-वार्ता के नाम पर ये मुफ्त में प्लेटें साफ़ करने भारत क्यों आते हैं?
भारत को अब पाकिस्तान से  दो-टूक कह देना चाहिए कि शान्ति-वार्ता तभी होगी जब ये नेता पाक सेना पर नियंत्रण का प्रमाण लेकर आयेंगे अन्यथा पाक भारत की ओर से निर्णायक कार्रवाई के लिए तैयार रहे।
 पाक की 'फितरत' को देखते हुए भारत को अब ये समझ लेना चाहिए कि पाक शान्ति-वार्ता के लिए वास्तव में तभी तैयार होगा जब उसे यह अहसास हो कि भारत के खिलाफ़ उसका एक कदम उसके लिए आत्मघाती साबित होगा और उसका एक गलत कदम उसकी ताबूत की आखिरी कील साबित होगा।

पाक के न सुधरने के कुछ कारण हैं-
  1. पाक कश्मीर मुद्दा इसीलिए उठाता है क्योंकि इस मुद्दे की आड़ में वह नौजवानों को भड़का कर आतंकवादी संगठनों में शामिल करता है। इसलिए अगर कश्मीर मुद्दे के समाधान के लिए कश्मीरी लोगों की इच्छा के विरुद्ध पूरा कश्मीर पाक को सौंप दें तो भी वो शांति स्थापित नहीं करेगा और अगले ही दिन यही मुद्दा पंजाब और बंगाल के लिए उठा देगा ।
  2. दूसरी वजह यह है कि वो जानता है कि जब तक आतंकवाद है तभी तक उसे आतंकवाद से लड़ने के नाम पर विदेशों से 'आर्थिक मदद' मिलेगा।

निर्णायक कार्रवाई जरूरी होने  की स्थिति में हमें चीन का भी सामना करना पड़ सकता है क्योंकि चीन हमेशा परोक्ष रूप से पाक का ही साथ देता रहा है। इसलिए ऐसी स्थिति में आसियान देशों के साथ-साथ अमेरिका के साथ हमें अपने सम्बन्ध मज़बूत करके एक गुट बनाने की जरूरत पड़ेगी। आसियान और दुसरे पड़ोसी देश भारत के स्वाभाविक मित्र हैं क्योंकि ये सभी चीन या पाक या दोनों से परेशान हैं और अब अपना विकास चाहते हैं। कुछ ऐसी ही स्थिति अमेरिका की है।
अमेरिका के साथ  सम्बन्ध सुधारने की कुछ और वजहें हैं-
  • अमेरिका चीन के खिलाफ एशिया में शक्ति-सन्तुलन  स्थापित कर सकता है जो कि उसका सबसे बड़ा प्रतिद्वंदी है।
  • अमेरिका आतंकवाद के खिलाफ़ लड़ाई के नाम पर पाक की blackmailing से परेशान  हो चुका है और यह समझ चुका है कि 'आर्थिक मदद' देने से पाक आतंकवाद को समाप्त नहीं करने वाला।
  • भारत-अमेरिका के सम्बन्धों का सीधा असर अनिवासी भारतीयों पर पड़ता है।
  • भले ही अमेरिका दुनिया में अपनी दादागिरी के लिए जाना जाता हो मगर एक सशक्त लोकतान्त्रिक राष्ट्र है  और पूर्व में गुलामी भी झेल चुका है इसलिए भारत की समस्या को बेहतर समझ सकता है।
  • आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई में वह पहले से ही भारत के साथ है। 

Sunday, January 6, 2013

31st Day :: & now mixing in thoughts

हम लोग अभी तक audio-mixing ,  video-mixing और खाने-पीने की चीजों में विभिन्न प्रकार की मिलावट से ही दो-चार होते रहे हैं। मगर दूसरी technologies की तरह mixing की technology भी उन्नति कर रही है। मैं आजकल एक नए तरह की मिलावट से रूबरू हुआ, यह थी हमारे महापुरुषों के विचारों में मिलावट!
जी हाँ आपने बिलकुल ठीक सुना , आजकल news में भड़काऊपन और महापुरुषों के विचारों में confusive & abeted thoughts की मिलावट चल रही है।
हमारे पास का mixer-grinder फलों और दूध को या फिर अलग-अलग चीजों को पीसकर मसाला बनाने के ही काम आती है, मगर हमारे नीति-नियन्ताओं के पास ऐसा mixer होता है कि ये किसी भी चीज में किसी भी चीज को इस तरह मिला सकता है कि बड़े से बड़ा जाँचकर्ता भी इस मिलावट को न पकड़ सके।
वैसे तो ये सब कई दिनों से चल रहा है, मगर मैं आज की ताज़ा खबर के बारे में ध्यान आकृष्ट करना चाहूँगा-
अमर-उजाला के पेज-13 पर स्वामी विवेकानंद जी के बारे में लिखा है कि वो 31 बीमारियों से ग्रसित थे और उन्हें मधुमेह भी था। इसी वजह से 39 साल की अल्पायु में उनकी मौत हो गयी और interesting बात यह है कि यहाँ लेखक के माध्यम से यह कहने की कोशिश की गयी है कि वो इस बात में विश्वास रखते थे कि 'शरीर बीमारियों का मंदिर है'। थोडा सा दिमाग पर जोर डालिए,आप पायेंगे कि यह 'शक्तिमान' द्वारा कहे गए वाक्य 'Body is temple' का ठीक उलटा है! क्या स्वस्थ तन-मन के धनी (जैसा कि उनके चित्रों और विचारों से साफ़ झलकता है) विवेकानंद जी ऐसा कह सकते हैं?
दूसरी बात जो बिलकुल भी गले नहीं उतरती वो यह है कि 'उन्होंने कहा था कि गीता पढने से अच्छा फुटबाल खेलना है'। क्या एक ऐसा महापुरुष जिसके गुरु श्रीराम-कृष्ण मिशन के संस्थापक थे (यानी कि जो राम और कृष्ण दोनों की शिक्षाओं में विश्वास रखते थे), ऐसी बात कहने की सोच भी सकता है ?
ऐसी ही कुछ और विरोधाभाषी वाक्य आपको मिल सकती है अगर आप विवेकानंद जी की शिक्षाओं की आज उपलब्ध किताबों और दस साल पहले की प्रकाशित पुस्तकों के बीच तुलना करेंगे।
दरअसल यह हमारे नीति-नियन्ताओं द्वारा फैलाया जा रहा भ्रम है जो हमारे देश के युवाओं को राह से भटकाने के लिए किया जा रहा है। क्योंकि वो इन युवाओं की जागरूकता और सक्रियता से डर गए हैं और इसलिए हर उस चीज को destroy कर देना चाहते  हैं जो इन युवाओं को प्रेरित करती हो !
........................................!   Jai Hind   !........................................

Wednesday, January 2, 2013

30th Day :: Hindi vs English medium education

आजकल जब मैं किसी parent को अपने छोटे बच्चे को यह सिखाते हुए देखता हूँ कि 'बेटा  वो Dog है, that is Cow, this is potato, you are eating tomato' etc तो मुझे यह सोचकर दुःख होता है कि क्या हमारी मातृभाषा इतनी बुरी है कि हमें अपनी बेसिक चीजों के नाम भी हिंदी में लेने में शर्म आती है।  वास्तव में english  medium सिर्फ़ status-symbol ही नहीं है बल्कि एक ऐसी मानसिकता है जो अंग्रेजों ने सैकड़ों वर्षों के शासन काल में हमारे दिमाग में भर दिया है कि english, high-profile लोगों की भाषा है और हिंदी निम्न वर्ग  की।
सोचिये जरा कि english-medium schools में पढ़ने वाला ऐसी मानसिकता  का बच्चा चाहे जितना भी पढ़ ले, हिंदी-भाषियों के साथ कैसा बर्ताव करेगा और क्या कभी आम लोगों के लिए कुछ करने का जज़्बा उसमें होगा?
ऐसा नहीं है कि मैं english का oppose कर रहा हूँ। भले ही अंग्रेज़ बुरे थे लेकिन english ने हमें एक ऐसा माध्यम दिया है जिससे global-communication आसान हो गया है।
मुझे english के हमारी नंबर दो भाषा बनने पर ऐतराज़ नहीं है लेकिन मैं इतना ज़रूर चाहता हूँ कि यह हमारी basic language न बन जाए और हिंदी-भाषी और अंग्रेजी जानने वालों के बीच दूरी की वजह न बने।
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29th Day :: Think above the skirt

आजकल rape-victim की मौत से पूरे देश में शोक और आक्रोश का माहौल है। बेशक मुझे भी इस घटना से बेहद दुःख पहुँचा है। फिर भी आज मैं एक ऐसी बात लिखने की हिम्मत कर रहा हूँ जिस पर बहुत से लोगों को आपत्ति होगी।
आजकल स्कूलों में लड़कियों के स्कर्ट (या कहें कि mini-skirt ) पहनने के ऊपर विवाद चल रहा है। बिना किसी का पक्ष लिए मैं यह कहना चाहूँगा कि भले ही स्कर्ट का सम्बन्ध rape से न हो लेकिन क्या कोई मुझे यह बताएगा कि स्कूलों में इस तरह के dress का क्या use  है?
चलिए मैं यह भी मान लेता हूँ कि इसका सम्बन्ध sexual orientation से नहीं है और इससे पढ़ाई के समय दिमाग divert नहीं होता फिर भी इतना तो आपको भी मानना पड़ेगा कि यह public schools के show-off का माध्यम है।
मेरा कहना है कि schools में dress code ऐसा होना चाहिए जो show-off को नहीं बल्कि सादगी को प्रदर्शित करता हो! जिससे पढ़ाई का माहौल बनाने में मदद मिले और students की पढ़ाई में एकाग्रता बढे।
जो महिलायें इसपर विरोध जता रहीं हैं उनसे मेरा विनम्र निवेदन है कि इसे महिलाओं की स्वतंत्रता का हनन न समझें। नारी-स्वतंत्रता का मतलब यह नहीं है कि आप सार्वजनिक स्थानों पर भड़काऊ कपड़े पहनें, निजी स्थानों और पार्टियों में आप ऐसे कपडे पहनने के लिए स्वतंत्र हैं ।
आख़िर क्यों हम होली और दिवाली पर जींस-टीशर्ट की जगह पारम्परिक कपड़े पहनते हैं ?  क्योंकि हमारे देश की एक विशेष पहचान है और पारंपरिक कपड़े इसी पहचान को प्रदर्शित करते हैं !
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