Sunday, February 18, 2018

71th Day :: Politics based on hate

The toxic people target a person with more contacts especially & captures his network by making the leader his friend or by making his contacts his (the leader's) eneamy (in case the leader denied that person's friend request)
in my case a game is being played in which i have to play a game in which benefit goes to it's sponsorsors in all ways.
in this game i have to fight with the people misbehave to me .
by one hand they support me on the other  hand they make agressive to the people (to those i have beaten for thier faults) & catch them for using them against me or other person as well in free of cost. in this way they play by both of thier hands & make profit while all others (me & the people beaten by me as well ) only loose in all other ways.
in my case tragedy is bigger because those toxic people have implanted a transmitter in my head & receiever in all other people close to me . everyone knows that every person has 1 good thought after 99 bad thoughts. so thus it's easier to make people hate me .

"it's my party" like thinking ::-  nearly every person has an attraction for any particular party or leader but it should be limited while i have seen people with nblood relations fighting for any particular leader or party while these parties use them only ...
....Be cool & confident ....

Monday, February 12, 2018

70th day :: A new mobile technology

आज हम एक ऐसे दौर में हैं जहां रोज एक नयी टेक्नोलॉजी की खोज हो रही है।  मैं फिलहाल मोबाइल टेक्नोलॉजी के बारे में बात करना चाहता हूँ। बदलते समय के साथ मोबाइल की सिम छोटी होती जा रही है, फिलहाल नैनो सिम का ज़माना है। साथ ही बिना  चिप वाले मोबाइल का चलन हो रहा है।
लेकिन मैं नो सिम & नो चिप और unibody मोबाइल  टेक्नोलॉजी की बात करना चाहता हूँ। शायद कुछ ही लोगों को primo जैसी apps के बारे में पता होगा जो कुछ charge लेकर मोबाइल  नंबर उपलब्ध कराती हैं। लेकिन अभी मोबाइल में primary सिम का होना जरूरी है जबकि मैं मोबाइल में inbuilt number की बात करना चाहता हूँ। मैं चाहता हूँ कि कम्पनियाँ लोगों को रिलायंस के CDMA SET की तरह inbuilt number प्रोवाइड कराएं और मोबाइल नंबर पोर्टेबिलिटी को इतना आसान बनाएं कि customer को मनचाहा नंबर और network चुनने की पूरी आजादी मिले। यहां तक कि पोर्टेबिलिटी सिर्फ फिंगरप्रिंट वेरिफिकेशन (आधार कार्ड से जोड़ कर ) द्वारा हो जाए। 

Wednesday, August 16, 2017

69th day :: reality of dreams

ज़िन्दगी में हम सभी consciousness में रहते हुए एक लक्ष्य तय करते हैं और उसे पूरा करने का प्रयास करते है। यही 'लक्ष्य तक पहुँचने की इच्छा' को हम 'dream' (or  vision ) कहते हैं। जाने -अनजाने में यह 'इच्छा' (dream )  हमारे unconscious mind में भी स्टोर हो जाती है। इसलिए जब हम unconsciousness की दशा (or sleeping position) में होते है तो हमारा unconscious mind उस अधूरी इच्छा को पूरी करने के लिए एक पूरा animation या वीडियो बनाकर हमें हमारी इच्छा को पूरी होते हुए दिखाता है।
dreams के बारे में एक और बात सच है कि ये तभी आते हैं जब दिमाग में स्थित hormones में disbalance होता है या हमारा unconscious mind जागता रहता है।
एक स्वस्थ व्यक्ति जिसका सोने -जागने का समय निश्चित हो ,कोई तनाव न हो ,खाने -पीने की मात्रा निश्चित और उचित हो या hormonal disbalance न हो,  तो उसे सपने आने की probability भी बहुत कम होती है। इसका voice -versa भी उतना ही सही है।
e.g.   हम रात को खा-पी कर समय पर सो गए और हमारे उठने का समय 7 am  है लेकिन रात में 3 am को हमें पेशाब लग जाए तो क्या होगा?चूँकि हम उस समय नींद में हैं और हमारा conscious mind सोया रहता है ,हमारा unconscious mind work करता है।  अब चूंकि हमारे hormones सिग्नल दे रहे हैं कि हमें पेशाब करना है , तो हमारा unconscious mind एक animation create करेगा कि हम किसी जगह गए हैं और वहां एक नाली है , जिसमे हम पेशाब कर रहे होते हैं लेकिन असल में हम बिस्तर पर पेशाब कर रहे होते हैं।
बड़े होने पर तो हम कण्ट्रोल कर लेते हैं या जाग जाते हैं लेकिन बचपन में हम सभी ने ऐसा किया होगा। ///

Tuesday, August 15, 2017

68th day :: Modi or Tuglak

मीडिया में आजकल देश के प्रधानमंत्री मोदी जी छाए हुए हैं। पर क्या मोदी जी इतने चमत्कारिक हैं , जितना कि प्रचारित किया जा रहा है। लेकिन हक़ीक़त की जमीन पर मोदी क्या हैं ?
मेरे हिसाब से मोदी वर्तमान के तुगलक हैं  जो बहुमत की सत्ता के मद में चूर होकर , अपने विरोधियों को तो छोड़िये अपने सहयोगियों और अन्य एक्सपर्ट्स की राय लिए बिना फैसले पर फैसले लिए जा रहे हैं। ऐसे तानाशाही शासन को जनता कब तक बर्दाश्त करेगी।
मीडिया हर गलत फैसले की तुष्टिकरण के लिए कुछ खरीदे हुए लोगों के मुख से मोदी जी के पक्ष में कुछ बाते कहलवा दे रही है और देश की जनता टीवी के सामने बैठकर 'All is Well' के सपनों में जी रही है।
अब मोदी जी के तुगलकी फरमानों पर एक नज़र डालते हैं :-
मोदी जी ने सत्ता में आते ही 100 दिनों के अंदर काला धन देश में वापस लाने का सपना दिखाया था। बहुत शोर - शराबे के बाद आज का सच ये है कि कालेधन का मुद्दा दबाने के एवज में मीडिया और पॉलिटिक्स से जुड़े कई लोग 'slumdog millionair' की ही तरह slumdog से millionair बन गए और जनता आस लगाए बैठी रही। जनता यही सोचती रही कि मोदी जी के घर देर है अंधेर नहीं।
लेकि अंधेर भी तब हो गयी जब एक सुबह खबर मिली कि 500 और 1000 के नोट बंद कर दिए गए। इसके बाद आम जनता को सैकड़ों दिन लाइन में खड़ा कराने के बाद भी 'All is Well'  की थपकी के रूप में सांत्वना दी जाती रही।
फिर आया एक और तुगलकी फरमान देश में 'डिजिटल क्रांति' लाने का और 'cashless economy' का। 
demonetisation और पैसे निकालने की लिमिट के चलते देश का आम आदमी पहले से ही कैशलेस हो चूका था फिर ये अतिरिक्त प्रयास क्यों ? रही बात डिजिटल क्रांति की तो मोदी जी को ये कॉमन सी बात अपने दिमाग में डाल लेनी चाहिए थी कि जिस देश की आधी आबादी निरक्षर हो , वहाँ जबरदस्ती डिजिटल क्रांति करवाने से क्या फायदा होगा। ऐसे लोग मोबाइल और कंप्यूटर के तामझाम को कैसे समझेंगे। और फिर भी अगर ये डिजिटल क्रांति हो भी गयी तो काम पढ़े - लिखे लोगों के साथ धोखाधड़ी के मामले बेतहाशा बढ़ जायेंगे। 
इसलिए मोदी जी को पहले सम्पूर्ण साक्षरता अभियान चलाना चाहिए था।  उसके बाद ही डिजिटल क्रांति सही मायनों में सफल हो सकती है।
यहाँ मैं ये बताना जरूरी समझता हूँ कि मीडिया के ताजा विश्लेषण के अनुसार demonetisation और ऐसे ही अन्य तुगलकी फरमानो की वजह से लोगों को परेशानियाँ तो उठानी ही पड़ी ,साथ ही देश को आर्थिक स्तर पे भी घाटा सहना पड़ा। 
मतलब कि मोदी जी के फैसलों से फायदा नाममात्र का हुआ है और बेशुमार नुकसान ,
इसलिए यही है तुगलकी फरमान। .!!

Thursday, June 22, 2017

67th Day :: why i couldn't laugh at the comedy shows and films in india

आजकल tv channels पर comedy shows की बाढ़ सी आ गयी है और साथ ही आ गयी है इनपर भद्दे और अश्लील comments की बाढ़।
 एक अच्छा कॉमेडियन खुद पर व्यंग्य करके कॉमेडी पैदा करता है(जैसे कि सर्कस में एक जोकर करता है) न कि दूसरों की खिल्ली उड़ाकर और अश्लील कमेंट्स की मदद लेकर।
जैसा कि मैंने पहले भी बाज़ारवाद के post में लिखा है कि दिक्कत किसी वस्तु को बेचे जाने से नहीं होती बल्कि बाजार के saturated होने के बाद जबरदस्ती जरुरत पैदा करने की कोशिश से होती है।  और कॉमेडियंस को sexual topics और guests की खिल्ली उड़ाने वाले टॉपिक्स ऐसे ही आसान मुद्दे लगते हैं। जिनसे रोज के show के लिए मसाला मिल जाता है otherwise अच्छे मुद्दों पर कॉमेडी करने के लिए ज्यादा मेहनत और ज्यादा time की जरूरत होती है जो ये कॉमेडियन करना नहीं चाहते ।
कभी -कभी तो ये कॉमेडी guests और public के लिए भी असह्य हो जाती है।  इसलिए कॉमेडी करते समय guests और दर्शकों की भावनाओं का सम्मान करना चाहिए।
 ..........jai hind.........
...........be cool...........

Tuesday, June 6, 2017

66th Day :: Misuse of Confusion in Politics

Confusion has its own pros & cons. I had tell you before in my previous post that confusions are beneficial specifically in research because it helps to break set limits even when you don't have much will power to break it .  but its bad result is that it conjume much time and still results we get maybe wrong..because by the state of confusion we could  get the power to open an unknown gate but we didn't know that gate opens in the way of heaven or hell .so if we are in the state of confusion, we need somebody who knows the right way and at whom we can fully trust .
  but by our bad fate more people in the world are just opposite . such people who instead  of saving us from confusion, tries to get gain by throwing us in the situation of confusion.
these are those opportunist 50/50 type people who behave you good as well as bad behavior so that you never can decide to oppose them . and by this gain they reigne on us . they always  remain in contact with both the good as well as bad people . and thus by making quarrel between good and bad they reign on us . they never want to make justice , they just want to controll people so that they can reigne ...

.......jai hind.....!

65th day ::: जीत-हार का क्रम :: कितनी सच्चाई कितना भ्रम

कुछ दुर्भाग्यशाली लोगों (जिनके guardians लापरवाह होते हैं ) को छोड़कर बाकी सभी लोगों को जन्म से ही जीतना सिखाया जाता है। ऐसा करना पुरी तरह गलत भी नहीं है लेकिन हम जीतना सिखाते हुए ये सिखाना भूल जाते हैं कि जीत किस कीमत पर पाना चाहिए । हमें ये ध्यान देना चाहिए कि कहीं हम जीत से मिलाने वाले पैसे या ख़ुशी या सम्मान आदि से ज्यादा जीत हासिल करने के लिए गँवा तो नहीं रहे ?
     आजकल दुनिया में ऐसी ही आपाधापी मची है। सबको जीत चाहिए चाहे उसके लिए कुछ भी कीमत चुकानी पड़े। ऐसे लोग ही अधिकतर कुछ चालाक लोगो का काम या तो प्यादा बनकर जीतने के लिए करते है या फिर किंग बनकर न हारने के लिए ही करते हैं।
कीमत चुकाने के उदहारण के तौर पर देखें तो एक छोटी सी नौकरी पाने के लिए लोग 5-10 लाख तक रिश्वत देने को तैयार रहते हैं। चाहे उतनी रकम वसूलने में जिंदगी ही क्यों न गुजर जाए।
दूसरे उदाहरण के तौर पर हम देख सकते है कि जीत और पैसे के लिए लोग कितना नीचे गिर जाते हैं।  यहाँ तक कि लोग murder , molestation  और rape से भी बाज नहीं आते।
हमें किसी को जीतना सिखाने से पहले यह सिखाना चाहिए कि उस जीत को पाने के लिए किस हद तक जाना चाहिए। मैंने देखा है कि जिस हद तक हम molesters आदि का विरोध करते है , उससे कहीं ज्यादा हद तक molesters आदि अपने बॉस से इनाम पाने के लिए ऐसा करने को तैयार रहते हैं।
         इसलिए हमें अपने बच्चों को जीतना सिखाते हुए ये जरूर सिखाना चाहिए कि जीत केवल तभी तक जरूरी है जब तक कि जीतना सही हो वरना गलत होने पर हारना , जीतने से अच्छा है।  यहाँ तक कि भले ही एक छोटे से बच्चे से हारना पड़े।

........jai hind......jai bhaarat.................!